मध्य रात्रि का समय था आसमान में बादल छाए हुए थे हल्की हल्की रिमझिम रिमझिम बारिश हो रही थी ऐसे ही मौसम में वृद्ध आश्रम के कोने वाले पलंग पर ऐक बूढ़ा आदमी कराह रहा था शायद उसे ज्वर था तभी तो वह बार-बार करवटें बदल रहा था कभी कभी वह कुछ समय के लिए नींद के आगोश में चला जाता था जहां वह सपने में आसमान का विचरण करने लगता था कभी कभी वह अतीत कि सुनहरी यादें में खो जाता था उन सुनहरी यादें में उसके चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी तब कभी वह अपने बुरे समय को याद करके सिहर उठ जाता था तब कभी अर्ध चेतना में कुछ बड़बड़ाने लगता था ऐसे ही वह अतीत में चला गया था।
जी हां उसका नाम सेठ धनीराम था मुंबई में कपड़े का बहुत बड़ा व्यापार था खुद कि टेक्सटाइल कंपनी थी अनेकों नोकर चाकर थे बड़ा बंगला था बड़ी बड़ी महंगी गाड़ियां कारें थी पत्नी थी तीन प्यारी प्यारी बेटियां जिन्हें उन्होंने बड़े लाड़-प्यार से पाल पोस कर तैयार किया था उस समय के सबसे अच्छे कालेज में पढ़ाया था सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था अचानक उसे व्यापार में घाटा होने लगा था शायद बाजार से उसकी पकड़ कमजोर हो गई थी या फिर उसके निर्णय गलत साबित हो रहें थे तभी तो देखते देखते ही सब कुछ बर्बाद हो रहा था धीरे धीरे मिल कारें और चल अचल संपत्ति सब बिकने लगें थे खैर उसने बची हुई कुछ संपत्ति से बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी और धूमधाम से तीनों बेटियां का ब्याह कर दिया था शायद वह पिता ऋण से मुक्त हो गया था।
घर में दोनों पति-पत्नी ही थे पत्नी कभी कभी कहतीं देखो हमारे पास पैसा नहीं है अपना बुढ़ापा कैसे निकलेगा तब सेठ लछ्मी चंद्र हंसकर कहते थें हमारी तीन बेटियां हैं जो बेटों से बढ़कर है और हमने उन्हें अच्छे संस्कार दिए हैं अच्छी शिक्षा दी है अरे चार चार महीने ऐक ऐक बेटी के घर रहेंगे तब बुढ़ापा यूं ही निकल जाएगा वह ऐसा हंसकर कहते थे शायद उन्हें बेटियां पर नाज था भरोसा था उनके समझाने पर पत्नी भी खुश हो जाती थी
चूंकि बाजार कि देनदारी ज्यादा थी आमदनी का कोई जरिया नहीं बचा था ऐसे में उन्हें अपना बंगला बेचना पड़ा था किराए के छोटे से फ्लैट में शिफ्ट होना पड़ा था समय का पहिया तेजी से बढ़ रहा था अब पति पत्नी दिन प्रतिदिन बूढ़े हो रहें थे आमदनी का जरिया खत्म था और बेटियां अपनी ख़ुद कि मजबूरी बता कर बहाना बना रही थी शायद ऐक दुसरे पर माता पिता कि सेवा ढोल रही थी या यूं कहें कि उनके पास पैसा नहीं था इसलिए बेटियां भी अनदेखा कर रही थी ।
कहते हैं कि कलयुग चल रहा है यह युग अर्थ युग है यहां भावनाओं का कोई मूल्य नहीं मानव संवेदनशीलता खत्म हो रही परिवारिक रिश्ते खत्म हो रहें मानवीय मूल्यों का कोई मतलब नहीं है मानव जीवन सिर्फ सिर्फ पैसा कमाने में सिमट गया है हाय पैसा रे पैसा पैसा है तो सबकुछ है पैसा है तब रिश्ते हैं पैसा है तब पत्नी हैं पैसा है तब अपने बच्चे है पैसा है तब संसार के सभी सुख अपने हैं लेकिन शायद मन कि शांति पैसा से नहीं खरीद सकते शांती का कोई मूल्य नहीं वह तो अनमोल है जो मनुष्य को गहन विचार चिंतन से ही मिलती है
सेठ लछ्मी चंद्र को फ्लेट मालिक ने कानूनी नोटिस भेजा था उन्होंने बहुत बिचार किया बेटियों से आर्थिक मदद मांगी थी लेकिन कहीं से कोई भी मदद नहीं मिली थी दोनों पति-पत्नी निराशा के गहरे गर्त में खो गए थें रातों कि नींद गायब हो गई थी कभी कभी पत्नी कहती कि आप को बेटियों पर बहुत नाज था अब वह घमंड कहां गया देखो पहले ही चेताया था कि धूमधाम से शादी मत किजिए कुछ अपने लिए बचाकर रखना चाहिए लेकिन आप ने मेरी ऐक भी नहीं सुनी अब ऐसे बुढ़ापा में कहां जाएं कहां छत नसीब होगा कहां दो बकत कि रोटियां नसीब होंगी कौन बुढ़ापे कि लाठी का सहारा बनेगा कोन ऐक गिलाश पानी पिलाएगा ....
अक्सर हमें देखने को मिलता है कि भारतीय शादी व्याह में अपनी हैसियत से ज्यादा पैसा खर्च करते हैं कुछ तो कर्ज में डूब जाते हैं और जिन बच्चों के लिए वह पैसा खर्च करते हैं वहीं बच्चे अपने परिवार में खो जाते हैं और माता पिता को आप ने मेरे लिए क्या किया यह उलाहना सुनने को मिलता है बच्चों कि ऐसे जबाब से माता पिता टूट जाते हैं बिखर जाते हैं बस चुपचाप कड़ी मेहनत कर के कर्ज उतारने लगते हैं ऐसे में उनका जीवन निरश हों जाता है वह अपने खुद के लिए भी नहीं खुलकर जी पाते हैं बस चुपचाप अपनी ग़लती पर पछताने लगते हैं ।
दूसरा भारतीय समाज में कुछ जगहों पर मृत्यु भोज देखने को मिलता है जिसमें वह हजारों मेहमानों को निमंत्रण पत्र भेज कर बुलाते हैं विडंबना देखिए जीतें जी माता पिता दादा दादी कि सेबा नहीं करते हैं बेचारे बुजुर्ग ऐक घर के कोने में पड़े हुए अपनी मृत्यु का इंतजार करते रहते हैं ।
सारे संसार में भारत ऐसा देश है जहां वृद्ध आश्रम हैं समाज के कुछ दयावान अरबपति दान देकर थके हुए टूटे बूढ़े परिवार से निष्कासित पुरूष महिलाओं को आश्रय देकर पुनीत कार्य करते हैं मेरे ख्याल से उनका यह कदम सराहनीय है ।
दोनों पति-पत्नी जीवन कि आखिरी जंग में ऐक दूसरे को समझा रहे थे ऐक दूसरे का सहारा बनना चाहते थे लेकिन समझाने से काम चलने वाला नहीं आखिर उन्हें फ्लेट छोड़ना पड़ा था कुछ दिनों रेलवे स्टेशन पर व्यतीत किए थे फिर किसी ने उन्हें वृद्ध आश्रम का पता बताया था कुछ कागजात पर कानूनी कार्रवाई होकर उन्हें वृद्ध आश्रम में रहने के लिए मिला था प्रबंधकों ने उनकी तीनों बेटियां से बात कि थी बेटियों को कोई आपत्ती नही थी बूढ़े बीमार लाचार अब उनका परिवार था उन बूढ़ों में बड़े बड़े रिटायर अधिकारी थे जिनके बेटे बेटियां विदेशों में महंगे पेकैज पर काम कर रहे थे उन बेटे बेटियों में कोई सॉफ्टवेयर इजीनियर था तब कोई ऐ आइ पर काम कर रहा था तब कोई युवा वैज्ञानिक था तब कोई डाक्टर इंजीनियर था जिनके पास समय कि कमी थी जिनके पास पैसा तो था लेकिन संवेदना नहीं थीं जिनके पास शिक्षा तो थी लेकिन परिवारिक मूल्य नहीं थी जिनके पास साधन तो थे लेकिन माता पिता के लिए जगह नहीं थी जिनके पास पत्नी तो थी लेकिन माता नहीं थी जिनके पास पुत्र तो था लेकिन पिता नहीं थे वह सभी बदनसीब थे शायद उन अभागों को यह नहीं पता था कि ऐक दिन उन्हें भी बूढ़ा होना है ऐक दिन उन्हें भी बुढ़ापा में लाठी का सहारा लेना हैं ऐक दिन उन्हें भी बच्चों कि किलकारियां सुनने के लिए तरसना हैं ऐक दिन उन्हें भी किसी ऐसे ही आश्रम में आश्रय ढूंढना है ऐक दिन...
वृद्ध आश्रम का वातावरण बहुत शालीन था सारे वृद्ध एक दूसरे का दुःख दर्द समझते थे ऐक दूसरे का सहारा बन रहें थे अगर कोई बीमार हो जाता तब सभी वृद्ध उनकी सेवा में तत्पर रहते कोई प्रबंधक से कहकर दवाईयां मंगवाता तब कोई अपनी पेंशन के पेसै से फल फूल डाक्टर को बुलवाता कोई बूढ़ा अपनी जवानी के किस्से सुनाता तब कोई कविताएं कहानियां सुनाता तब कोई वर्तमान समय कि विश्व राजनीति पर अपना लेक्चर देता तब कोई सरकारी योजनाओं में खामियां निकाल कर अपने आप को बुद्धिजीवी समझता तब कोई कागज़ पेन लेकर वर्तमान समाज संस्कृति संस्कार पर लेख लिखकर सभी को सुनाता उन बूढ़ों को विश्वास था कि किसी अखबार के पहले पन्ने पर उनका लेख छपेगा वह भी फोटो के साथ कुछ उनमें साहित्यकार भी थे तब कुछ गायन कला में निपुण थे कुल मिलाकर वह सब अपनी-अपनी दूनिया में मस्त थे लेकिन श्रीमती सेठ धनिराम कि अर्धांगी अंदर से टूटने लगीं थीं शायद बीमार रहने लगी थी अक्सर उन्हें बेटियां याद आने लगी थी उनका चोटियां बालापन का नटखट पन रूठना मनाना याद करके सिहर जाती थी और रोने लगती थी दुःख में मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा आंसू हैं जिनके बहनें के साथ मन हल्का हो जाता है मन को शांति प्रदान हों जाती है मन नयी आशा उमंग से भर जाता है शायद मन को भगवान् भरोसे छोड़ दिया जाता है।
उस रात भी वारिस हों रहीं थी मेघ गर्जन करते हुए प्यासी धरती को अपनी अनमोल बूंदों से तृप्त कर रहे थे दूर कहीं बिजली किसी मंदिर या बृछ पर गिर गई थी आश्रम के बाहर कुत्तों कि रोने कि आवाज सुनाई दे रही थीं ऐसे ही मौसम में बुढ़िया ने कांपते हुए स्वर में सुनो मेरा समय आ गया है यमराज मुझे भगवान् के पास ले जाने के लिए आ गये है देखो जीवन में जितना बना साथ दिया मुझे पता है तुम्हारा ख्याल रखने वाला कोई नहीं फिर भी अपना ख्याल रखना ....... हिचकी के साथ बुढ़िया के प्राण निकल गए थें आश्रम के सभी सदस्य सेठ लछ्मी चंद्र को समझा रहे थे कि जीवन ऐक स्वप्न है हम सब उसी स्वप्न में जी रहे हैं सभी को इस नश्वरता का सामना करना हैं फिर दुःख कैसा शब्दों को कहना बहुत आसान है और उन्हें चरितार्थ करना बहुत मुश्किल
सेठ लछ्मी चंद्र बिलख बिलख कर रोने लगे थे सहसा उन्होंने भी पत्नी कि छाती पर अपने प्राण त्याग दिए थे ऐसा अद्भुत प्रेम सौहार्द बिरला ही देखने को मिलता है ।
आश्रम के सभी सदस्यों ने दो अर्थी या सजाई थी बैंड बाजा भी बुलाया गया था धीरे धीरे शव यात्रा श्मशान घाट पहुंच गई थी उनकी बेटियों को खबर दे दी गई थी बेटियों ने समय नहीं है नहीं आ सकते आनलाइन संस्कार में शामिल हों जाएंगे कहकर पल्ला झाड़ लिया था बड़ी बेटी ओनलाइन होकर माता पिता कि चिता कि आग को देखना चाहतीं थी उसने कुछ पैसा ऑनलाइन ट्रांसफर किया था सहसा उसने कहा था कि अभी कितना समय लगेगा मुझे नहाना भी है विडियो काल पर उसके ऐसा कहने से सभी लोग सकते में रह गये थे माता पिता के लिए ऐसा प्रेम ऐसी संवेदनशीलता ऐसी निष्ठा
जिन माता पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया जिन माता पिता ने पाल-पोस कर बड़ा किया जिन्होंने पढ़ाया लिखाया शादी व्याह किया ऐसी-ऐसी औलाद का होना जरूरी नहीं बिना औलाद के ही अच्छा आखिर कहां जा रहे हैं हम हमारी नयी पीढ़ी या कहां जा रहे हैं हमारे नैतिक मूल्य कहा कहां ....
कहानी कैसी लगी कमेंट करके बताना

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