नेपाल में जो जन हानी धन हानी और पशु हानी हुई तस्वीरें देखकर आंखें से अश्रु धारा बहने लगती है चंद मिनटों में सब कुछ खत्म हो गया और हम सब कुछ भी नहीं कर पाए माना कि यह टेक्नोलॉजी का युग है विज्ञान क युग है मशीनों का युग है लेकिन हमारी उन्नत टेक्नोलॉजी धरी कि धरी रह गई ऐसी टेक्नोलॉजी का क्या भरोसा अब सवाल यह है कि यह सब कैसे हुआ।
जैसा कि हमने अपनी सुख सुविधाएं के लिए प्रकृति का भरपूर इस्तेमाल किया और आगे करते रहेंगे हमने नदियों पर बड़े बड़े बांध बनाए हमने हमने पहाड़ों के अंदर सुरंगों को खोदा हमने बहुत सारी परियोजना के लिए पहाड़ों को ब्लास्ट किया हमने बड़े बड़े जंगलों को काट कर अपने लिए खेती योग्य भूमि बनाई हमने जंगली जानवरों से उनके निवास स्थान छीनें और बहुत कुछ ??
अब सबाल यह नहीं है कि हमने ऐसा क्यों किया सबाल यह है कि हम ऐसी प्राकृतिक आपदओं से कैसे बचें शायद इसका उत्तर तो विज्ञान के पास भी नहीं होगा ?
ऐक रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर्वत पर लगभग चार हजार बर्फ के पहाड़ है उनमें से कुछ पहाड़ पिघल रहे हैं और कुछ पहाड़ो का हिस्सा बिना ठोस धरातल के हवा में लटक रहा है जो कभी भी हल्के भूकंप के झटके से गिर सकता है परिणामस्वरूप तबाही भीष्ण तबाही अगर हम उस दृश्यकी कल्पना करें तब हमारे रोंगटे खड़े हो जाएंगे भगवान् ना करें हमें आगे ऐसा कुछ देखने को मिलें ।
अब आते हैं ऐसा क्यों हुआ और ऐसा क्यों होगा इसका जवाब यह है कि जब मैं छोटा था तब मेरे गांव में बहुत जंगल था जंगली जानवर और हम अपनी अपनी सीमाओं में खुशी खुशी रहते थे लहराते जंगल के फूलों कि सुगंध से मन खुश हो जाता था कभी भी हिरण खरगोश और जानवर दिखाई दे जाते थें हिरण कि छलांग देखकर बचपन में बैसे ही छलांग लगाने का मन होता था लेकिन आज मैं पचपन साल का हूं अब ना वहां जंगल बचा है और ना ही जानवर सब कुछ खत्म हो गया चारों ओर उजाड़ा हुआ दिखाई दे रहा है बस खेत ही खेत अच्छा उस समय मेरा गांव बहुत छोटा था जनसंख्या भी बहुत कम थी उस समय गांव में कच्चे घर थे जो ठंड में गर्म रहते थे और गर्मी में ठंडे उस समय ऐ सी क्या होता है हम जानते भी नहीं थे हर घर में गाय भैंसे भेड़ बकरी बैल होते थे पूरा परिवार मिलकर उन सभी जानवरों का पालन पोषण करता था अच्छा वह जानवर भी पूरे परिवार का ख्याल रखते थे गाय भैंसे ताजा ताजा शुद्ध दूध देती थी वहीं बैल हल बखर बैलगाड़ी रहट कि जिम्मेदारी अपने कंधों पर रख कर निर्वाह करते थे लेकिन आज बैलों के कंधों कि जगह ट्रेक्टर ने ले ली है गायों बैलों के चरने के लिए कही भी जमीन नहीं है वह बेचारी भूखी दिन भर भटकतीं रहतीं हैं उनके हिस्से कि जमीन हमने छीन ली है अपने स्वार्थ के लिए अधिक धनवान बनने के लिए ।
मुझे याद है उस समय बर्षा बहुत होती थी हफ्ते हफ्ते सूर्य देव के दर्शन नहीं होते थे गांव के नाले नदियां अपनी सीमाओं में कल कल बहती रहती थी कारण उनकी सीमा में कोई अतिक्रमण नहीं था बारह महीने हमें शुद्ध ताजा पानी पीने को मिल जाता था उस समय पानी नहीं बिकता था लेकिन आज ना वैसीबरिश हो रही है और ना ही वैसी नदियां दिखाई दे रही है उनकी सीमा के दोनों तरफ मकान दिखाई दे रहे हैं और नदियों में जल ऐसे गायब हो गया है जैसे गधे के सिर से सींग ।
मुझे याद है जंगल में जब सियार आवाज लगाते थे तब मेरी दादी रात में कितने पहर हों गये है मुझे समझातीं थी और कोयल कि बोली से मौसम का अनुमान बताती थी टीटरी के अंडों को देखकर इस साल कितने महीनों पानी बरसेगा बतातीं थी उस समय जंगल में मोर नाचा करते थे बहुत सारे पंछी आप में एक दूसरे से संवाद करते थे उनके संवाद से संगीत कि मधुर धुन सुनाई देती थी जैसे कि वह सब मिलकर कोई अद्भुत मल्हार धुन गुनगुना रहे हों लेकिन आज कान तरसते हैं यह सब सुनने के लिए।
माना कि हमने तरक्की कि है माना कि हमने सेटेलाइट वनाए है जो कि धरती पर हमारे उपर पल पल कि नजर रखते हैं जो हमें पहले ही मौसम कि जानकारी देते है लेकिन ऐसी टेक्नोलॉजी होते हुए भी हम कहां चूक गए यह गहन विचार करने का विषय है।
माना कि आज हमारी मशीनें मंगल ग्रह पर जीवन को खोज रही है हों सकता है कि हमें इस मिशन में कामयाबी मिलेगी लेकिन मेरे ख्याल से अभी हमें बहुत लम्बे समय तक मंगल ग्रह पर मानव जीवन और मानवों को वहां पहुंच कर रहने का इंतजार करना होगा लेकिन इस बीच हमारे हाथ में धरती हैं इस धरती को प्रकृति के क्रोध से बचाव करना होगा ।
हमने आप सी प्रतिस्पर्धा के लिए विध्वंसकारी घातक हथियारों का निर्माण किया और हम इन हथियारों का ऐक दूसरे कि सीमाओं के अंदर इस्तेमाल कर रहे हैं कुछ हद तक हमें इन हथियारों का उपयोग करने का अधिकार है लेकिन क्या कभी हमने कल्पना कि हे कि इन हथियारों कि भी निश्चित समय सीमा होगी न जाने कौन सा हथियार कब इंसान कि पकड़ से बाहर निकल कर अपना रूद्र रूप दिखा दें फिर कैसा नज़ारा देखने को मिलेगा कल्पना भी नहीं कर सकते हमारे अविष्कार कब हमें निगल लें पता नही।
अगर हम पिछले पचास साल पीछे जाए तब उस समय जनसंख्या वृद्धि बहुत कम थी लेकिन अभी जनसंख्या वृद्धि अपने चरम पर है बढ़ती जनसंख्या वृद्धि दर के साथ हमारे गांव शहरों में घर बन रहें हैं चूंकि जमीन सीमित है ऐसे में मजबूर हो कर हम जंगल पहाड़ नदी नाले पर अतिक्रमण कर रहें हैं उनके अधिकार क्षेत्र को अपने निजी स्वार्थ के लिए उपयोग कर रहे हैं मेरे ख्याल से जनसंख्या वृद्धि दर पर विचार करना चाहिए ।
आइए हम प्रकृति की ओर वापस चलें हम हर साल नए पेड़ लगाए हम पहाड़ों को नुक्सान नहीं पहुंचाए हम जल का दुरूपयोग नहीं करें तभी हम पर प्रकृति दया करेंगी हम उस के प्रकोप से बच सकते हैं ।
यह लेख के लिए आप के क्या विचार है कमेंट करके बताइए।

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