ग्रीष्म ऋतु में गर्मी होना तो आम बात है लेकिन इस साल तापमान पचास डिग्री सेल्सियस दर्ज था कही कहीं तों यह डिग्री ऊपर नीचे हो रही थी ऐसे गर्म मौसम में इंसान के साथ जानवर भी परेशान थे सभी शीतल जल छांव के लिए भटक रहे थे गांव हों या फिर शहर सभी जगह का यहीं हाल था कारण विकास के नाम पर कुछ बरसों में असंख्य पेड़ों को काटा गया था उन पेड़ों कि जगहों पर सीमेंट कांक्रीट के जंगल दिखाई दे रहे थे जो कि गर्म होकर अतिरिक्त तापमान वातावरण में बिखेर रहे थे यह तो गांव शहर का हाल था और जंगल भी किसी विधवा महिला कि मांग जैसे सुखे हुए पड़े थे चूंकि बैसे भी पतझड़ का समय था और जो नीम आम जामुन जैसे पेड़ गर्मी में शीतल छाया देते थे वह सब तो इंसान ने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उन्हें नष्ट कर दिया था ऐसे में जंगली प्राणी बहुत परेशान थे उनमें से सबसे ज्यादा परेशान सियार था ।
शियार सारे जंगल में हुआं हुआं करता हुआ घूम रहा था उसके हुआ हुआ कहते ही दूसरा जानवर क्या हुआ तब शियार जबाब में गर्मी से हाल बेहाल हुआ रट लगाए चिल्ला रहा था भागते भागते सियार पहाड़ के पास पहुंच गया था वहां पर भी उसने हुआ हुआ
पहाड़ :- क्या हुआ ?
सियार :- गर्मी से हाल बेहाल हुआ
पहाड़ :- मेरा भी यही हाल हुआ
सियार :-कब हुआ
पहाड़ :- बरसों से हुआ इंसान से हुआ
सियार :- जो हुआ अच्छा नहीं हुआ
पहाड़ और सियार का संबाद होने के बाद तय हुआ कि हमें बैठकर इस समस्या पर विचार करना चाहिए फिर पहाड़ ने शियार से कहा कि तुम नदी नाले जंगल धरती सभी के पास जाकर कहना कि पहाड़ दादा का आदेश है कि बैठक करना है और इंसान कि सीमा तय करना है।
पहाड़ दादा के आदेश से सियार नदी के पास पहुंच कर हुआ हुआ
नदी :- क्या हुआ
सियार :- गर्मी से हाल बेहाल हुआ
नदी :- यह कैसे हुआ
सियार :- बहिन प्यास से गला बेहाल हुआ
नदी :- यह कैसे हुआ
सियार :- मत बन बहिन अनजान तुझे सब कुछ का हैं भान
तूं ख़ुद सुखी हुई है फिर भी है अभिमान
नदी :- माना कि तू चतुर हैं
जंगल का खुफिया अफसर है
और तुझ में कितनी अकड़ है
तुझे लगता इंसान से डर है
इसलिए तू ना खबर है
सियार और नदी का संबाद हुआ फिर बैठक का समय सियार ने बताया अब सियार नालों के पास पहुंच कर फिर हुआं हुआं करनें लगा नाले ने बिना संकोच से आने का प्रयोजन पूछ लिया सियार बैठक का समय बताकर आगे जंगल में वटवृक्ष के पास पहुंच गया वटवृक्ष दादा आधे मुरझा गए थे और आधे जीवन जीने के लिए संघर्षरत थे ।
सियार :- हुआं हुआं
वटवृक्ष :- क्या हुआ
सियार :- गर्मी से हाल बेहाल हुआ
वटवृक्ष :-यह कैसे हुआ
सियार :-दादा तूं हैं बूढ़ा चतुर निराला
फिर भी बनता है सीधा सादा
वटवृक्ष :- में हूं बूढ़ा याददाश्त हैं कमजोर
अब तू ही बता में कैसे बताऊं ।
खैर सियार और वटवृक्ष दादा का संबाद हुआ फिर बैठक का समय बताकर आगे हुआं हुआं करता हुआ धरती के उस जगह पहुंच गया था जहां लम्बी लम्बी सुरंग थी जिन्हें इंसान ने बड़ी बड़ी मशीन से खोदा था ।
सियार :- हुआं हुआं
धरती :-(सुरंग के अंदर से वापस आती आवाज )
गर्मी से हाल बेहाल हुआ
धरती :- यह कब हुआ कैसे हुआ
सियार :- तूं तो जगजननी है
फिर भी बनतीं अंजानी है
धरती :- माना कि तूं बहुत चतुर हैं
जानवरों में निपुण हैं
मत पहेलियां बुझा
सच सच बता कैसे आना हुआ
सियार फिर बैठक का समय बताकर आगे जंगल के राजा शेर के पास पहुंचा शेर ऐक पेड़ के नीचे गर्मी से बेहाल होते हुए भी आराम फरमा रहे थे सियार ने डरते डरते पहाड़ दादा का आदेश सुनाया ।
तय समय पर प्रकृति के सभी सदस्य ऐक जगह पर एकत्र हुए थें सभी सदस्यों ने मिलकर जंगल के राजा शेर को अध्यक्ष बनाया था
सभी समस्यायों कि सियार ने लिस्ट तैयार पहले ही कर ली थी सबसे पहले पहाड़ दादा को अपनी समस्या बताने को कहा गया था
पहाड़ :- शेर से हजूर जैसा कि हमारे उपर वृक्ष और जानवरों के रहने कि जिम्मेदारी है हजारों सालों से वृछ हमारे सीने पर हमारे मस्तिष्क पर हमारे सारे शरीर पर अपनी हरी भरी शाखाएं फैला कर हमें ठंडक दे रहे थे लेकिन हजूर इंसान ने मुर्मू पत्थर कि लालच में हमें खोखला कर दिया है और तो और हमारे सीने के अंदर से सुरंग बनाकर अपने लिए रोड रेलमार्ग बना रहा है ऐसे में मेरा शरीर लहूलुहान हो गया है क्या करुं आप ही बताइए ।
शेर ने बड़े ध्यान से पहाड़ दादा कि समस्या सुनीं थी फिर दहाड़ कर नदी से अब तुम अपनी समस्या बताइए बहिन कहा था।
नदी महाराज जैसे कि हजारों सालों से मेघ समुद्र से पानी लाकर आकाश से अनमोल बूंदों से धरती पर गिराते हैं वह सभी बूंदें इकट्ठी हो कर विशाल जलराशि बन जाती है जिस को हम अपने आगोश में लेकर समेट लेते हैं फिर हम अगली बरसात तक जंगली प्राणी और इंसान कि प्यास को बुझाते हैं लेकिन जैसे कि मुझे पता है कि जहां वृछ होंगे वहां मेघ पानी का वितरण ज्यादा करेंगे अब ना तो बृछ है और न ही मुझे उतना पानी मिलता है ऐसे में में हमेशा सूखीं रहतीं हूं हे राजन अब आप ही मेरी समस्या का निदान करें ।
शेर ने नदी कि समस्या को गंभीरता से सुना था फिर दहाड़ कर धरती से अपनी समस्या बताने को कहा था।
धरती मां रोते-रोते हे राजन् जैसा कि आप को मालूम है मुझे सभी जगत जननी कहते हैं मेरे सीने पर चर अचर सभी प्रकार के प्राणी रहते हैं जो मेरे लिए एक जैसे हैं लेकिन अब मैं उनका पालन पोषण करने में असफल महसूस कर रहीं हूं कारण यह है कि जगह जगह इंसान कभी पेट्रोल डीजल के लिए तब कभी कोयला या फिर कीमती रत्न के लिए मेरे सीने में भारी भरकम मशीन से बरछी के साथ मेरे सीने को लहूलुहान कर रहे हैं में बहुत व्याकुल हूं हे राजन अब आप ही बताइए मैं क्या करूं।
शेर ने धरती माता कि समस्या सुनने के बाद वृक्ष से अपनी समस्या बताने को कहा था।
बूढ़े वृछ वटवृक्ष ने कांपते हुएं हे राजन जैसा कि आप जैसे हमारी छाया के नीचे विश्राम करते हैं और राजन पंछी हमारी टहनियां पर अपने घोंसले बना कर रहते हैं लेकिन अब मुश्किल है क्योंकि हमारी संख्या दिन-प्रतिदिन कम होते जा रही है इंसान ने अपने उपयोग के लिए हमें नष्ट किया है ऐसे में हम क्या करें
शेर ने कुछ समय विचार किया था फिर सियार को निर्णय लिखने को कहा था पेन कागज़ पहले से तैयार था ।
शेर जैसा कि आज कि मीटिंग में आप सभी सदस्यों कि गम्भीर रूप से समस्या सुनने को मिली अब मैं अपना आदेश सुनाता हूं हमारा घर हमारी सीमाओं को इंसान ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया है और हमारा नुकसान किया है निश्चित रूप से उस नुकसान कि छति का आकलन करना संभव नहीं है ठीक है अब मैं आप सभी को आदेश देता हूं कि इंसान को जितनी अति करना हों करने देना फिर देखिए ऐक दिन इंसान कभी ज्यादा गर्मी तब कभी ज्यादा ठंड तब कभी अति बारिश तब कभी हिमालय पर्वत के ग्लेशियरों के रूप में जन हानी धन हानी का सामना करना होगा अभी का ताजा उदाहरण नेपाल का हैं आप लोग अभी के समय हम प्रकृति को कैसे अपने अस्तित्व को बचाना है इस पर ध्यान देने कि आवश्यकता है फिर दहाड़ कर
माननीय सदस्यों आइए हम मिलकर कसम खाते हैं कि हमारा जितना नुकसान इंसान ने किया है हम उनसे हजार गुना बसूल करेंगे वह भी व्यापक रूप से
यह कहानी आप को कैसी लगी कमेंट करके बताइए

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