सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रखैल सामाजिक कहानी


सावन का महिना था आसमान में बादल कि घटाएं छाई हुई थी कहीं कहीं रिमझिम रिमझिम बारिश हो रही थी दूर कहीं बिजली चमक रही थी और उसके बाद बादलों ने भीषड़ गर्जन कि थी ऐसा लगता था कि किसी पेड़ पर या देवालय पर बिजली गिर गई थी ऐसे ही मौसम में कुंवारी लड़की सेठ लछ्मी चंद्र के साथ साहचर्य में लिप्त थीं सेठ लछ्मी चंद्र उस लड़की के पिता जी कि उम्र का था लेकिन विस्तर पर सारे दांव पेंच लगाकर अपनी पहलवानी दिखा रहा था कुछ मिनट बाद वह कुंवारी लड़की उस कि छाती पर सिर रखकर सुनो क्यों न हम शादी कर लें  ।
ललिता प्यारी तुम्हें मालूम है कि अपने देश का कानून दो शादियां कि परमीशन नहीं देता फिर मैं पहले से शादीशुदा हूं दो बच्चों का पिता हूं बेटी तेरी उम्र कि है ठीक है हम लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं आजकल तो कानून भी ऐसे जोड़ों का सपोर्ट करता है फिर परेशानी क्या है अभी तो बेबी गर्ल मज़े लो 
लेकिन कभी में गर्भवती हो गई तब क्या होगा ललिता ने प्यार से प्रश्न किया 
सेठ लछ्मी चंद्र कुछ समय खामोश रहा फिर हम प्रोडक्शन का ध्यान रखते हैं ठीक मत चिंता करना 
भारतीय संस्कृति में रखैल शब्द को इज्जत नहीं मिलती है चूंकि हम अभी प्रतिवादी सामाज में जी रहे हैं और हमारे युवा पीढ़ी के विचार भी प्रगति सोच के हैं शहरी संस्कृति में ऐक दूसरे से कोई लेना-देना नहीं पड़ोसियों कि बात चीत नहीं होती सब अपने अपने जीवन में मस्त हैं और युवा पीढ़ी देह सुख के साथ केरियर पर ध्यान दें रहीं हैं साथ ही धन पर यह सत्य है कि निर्धन का समाज में कोई स्थान नहीं उसे हमेशा ताने और आलोचनाएं सुनने को मिलती हैं  ।
ललिता उच्च शिक्षत लड़की थी साथ ही उसके उच्च विचार वह प्राइवेट बैंक में मैनेजर जैसे पद पर कार्यरत थी गांव से दूर अकेली इंदौर शहर में रहतीं थीं उसकी तनख्वाह भी अच्छी थी ऐसे में उसे प्रपोज करने के  लिए युवा लड़कों ने बहुत कोशिश कि थी लेकिन सब जानते हुए भी ललिता ने उन्हें ठुकरा दिया था उसे लगता था कि उम्र दराज पुरुष वफादार और जीवन के प्रति बहुत गम्भीर रहते हैं य

यह सच है कि उम्र दराज पुरुष कि उम्र के साथ उनका जीवन जीने का नजरिया बदल जाता है ।
सेठ लछ्मी चंद्र शहर का जाना माना बिजनेसमैन था रियल एस्टेट क्षेत्र में उसका बड़ा नाम था शहर में बहुत सारी कालोनी हाईराइज विल्डिंग थी बड़ी बड़ी महंगी कारें थी नोकर चाकर थे ललिता कि पहली मुलाकात उससे बैंक में हुई थी सेठ लछ्मी चंद्र नये प्रोजेक्ट के लिए बैंक से कस्टमरों के लोन कि डील कराने गया था यूं सेठ लछ्मी चंद्र पचास साल से ऊपर कि उम्र का था लेकिन उसका शरीर कसा हुआ था लम्बाई भी छः फुट के आसपास थी गोरा चिट्टा रंग उसके व्यक्तित्व पर चार चांद लगा रहा था  पहली मुलाकात में ही ललिता उससे प्रभावित हो गई थी मोबाइल नंबर का आदान-प्रदान हो गया था फोन पर लम्बी लम्बी बातचीत होने लगी थी फिर ललिता कभी होटल के रूम पर तब कभी खुद के फ्लेट में उसके आगोश में समां ने लगी थी।
भारतीय संस्कृति में ब्याह सामाजिक व्यवस्था है चूंकि देह सुख के साथ संतान उत्पत्ति का यह सामाजिक व्यवस्था है इस व्यवस्था को सदियों से भारतीय समाज निर्वाह कर रहा है लेकिन समय के साथ सब बदल रहा है हमारे संस्कार हमारे व्यवहार 
खैर सेठ लछ्मी चंद्र ने कलाई घड़ी पर नज़र डाली थी और ललिता कल अमेरिका से मेरी बाइफ आ रही है में कुछ दिन तुमसे नहीं मिल सकता और हां मुझे ज्यादा फ़ोन भी नहीं करना।
ललिता को सेठ लछ्मी चंद्र से ऐसी उम्मीद नहीं थी उसे बहुत बुरा लगा था कुछ देर के लिए वह बिचार मग्न हो गई थी वह अपने भविष्य के बारे में सोच रही थी बिन ब्याही पत्नी का भविष्य का परिणाम कैसा निकलेगा सोचकर वह अंदर तक कांप गई थी मन ही मन उसने तय किया था कि ऐसे रिश्ते से बाहर निकल जाना चाहिये लेकिन कैसे वह गहरे दल दल में फस गई थी।
वह अतीत में खो गई थी तीन साल पहले पिता जी ने प्रोफेसर शादी के लिए लड़का देखा था देखने में वह लडका ठीक ठाक था लेकिन उसकी आंखों पर मोटा चश्मा उसे पसंद नहीं था इसलिए उसने वह रिश्ता ठुकरा दिया था ।
बाबूजी आप कैसे हैं ललिता ने फोन पर कहा
में ठीक हूं तू बता कैसी है 
में अच्छी हूं और आप को बताऊं जल्दी ही में अपने गांव के पास ट्रांसफर करा कर आ रही हूं अच्छा बाबूजी मां से बात करवाना 
बहुत सारे दिन बाद आज ललिता छोटी बच्ची बन गई थी माता-पिता से खूब बातें कि थी फिर बाबूजी आप को याद है आप ने मेरे लिए रिश्ता देखा था 
बेटी रिश्ते तो बहुत देखे थे लेकिन तूं ने अच्छे अच्छे रिश्ते ठुकरा दिए थे 
अरे वह लड़का जिसकी आंखों पर मोटा चश्मा लगा था जो प्रोफेसर था हां उसका नाम अविनाश था में आप पता करना कभी उसकी शादी नहीं हुई हों तब बात आगे बढ़ाना और हां आप मुझे उसका मोबाइल नंबर भेजना में खुद बात करूंगी बाबूजी में शादी के बंधन में बंधना चाहतीं हूं ।

माता पिता बहुत खुशी से झूम उठे थे उन्होंने अविनाश को फोन किया था कुशल मंगल पूछकर बातों बातों में शादी हुई कि नहीं सब पूछ लिया था  ललिता को फोन नम्बर भेज दिया था।

दोनों कि कभी फोन पर तब कभी विडियो काल पर लम्बी लम्बी बातचीत होने लगी थी ऐक दिन ललिता ने अविनाश से कहा अविनाश में अपने अतीत के बारे में कुछ बताना चाहती हूं अगर आप परमीशन दे तब 
अच्छा मुझे मालूम है कि आप किसी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में थी यहीं है ना 
कुछ देर तक दोनों खामोश रह गये थे फिर अविनाश ने प्यार से कहा में भी किसी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में था अब हमारा ब़ेक हों गया है और हम ऐक दूसरे को भूलकर अपना अपना जीवन हंसी खुशी जी रहे हैं ललिता केरियर के साथ हमारी-आपकी देह भी कुछ हमसे मांगती है हमारी जैसी युवा पीढ़ी हम स्वतंत्र है हमें अपने जीवन को अपने हिसाब से जीना है मेरे ख्याल से यह सब गलत है हमारे संस्कार ऐसा नहीं कहते भाई समाज ने विवाह बंधन हजारों सालों से बनाए है मेरा मानना है समय के साथ विवाह कर लेना चाहिए अक्सर देखने को मिलता है कि अधिक उम्र दराज हों जाने पर संतान उत्पत्ति में परेशानी होती है दूसरा यह लिव इन रिलेशन नैतिक मूल्यों से परे है देखिए हम दोनों ने ही नैतिक मूल्यों को अलग रख कर देह सुख के लिए गलत कदम उठाए थे कोई बात नहीं सुबह का भूला शाम को वापस आ जाएं तब भूला नहीं कहलाता में शादी के लिए तैयार हूं।

जी जी बिल्कुल मैंने जैसा सोचा था आप वैसे ही निकलें ललिता ने कहा 
तब बाबूजी से कहिए चट मंगनी पट ब्याह और हां शादी में फिजूलखर्ची मुझे पसंद नहीं सादगी के साथ दोनों परिवारों के सदस्य कुछ करीबी मेहमान ही रहेंगे।

ललिता और अविनाश शादी के बंधन में बंध कर खुशहाल जीवन गुजार रहे हैं ।
अक्सर देखने को मिलता है कि युवा पीढ़ी लिव इन रिलेशन में रहने के बाद ऐक दूसरे को छोड़ देते हैं उन जोड़ों में से एक ना एक अवसाद में चला जाता है सारा जीवन खराब हो जाता है यह कहानी लिखने का मेरा यही उद्देश्य था मैं युवा पीढ़ी पर अपने विचार नहीं थोपता न ही किसी भी देश के लिव इन रिलेशनशिप कानून के खिलाफ हूं 
आप लोगों को यह कहानी कैसी लगी कमेंट करके बताइए 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पिता कि चिता कहानी

 मध्य रात्रि का समय था आसमान में बादल छाए हुए थे हल्की हल्की रिमझिम रिमझिम बारिश हो रही थी ऐसे ही मौसम में वृद्ध आश्रम के कोने वाले पलंग पर ऐक बूढ़ा आदमी कराह रहा था शायद उसे ज्वर था तभी तो वह बार-बार करवटें बदल रहा था कभी कभी वह कुछ समय के लिए नींद के आगोश में चला जाता था जहां वह सपने में आसमान का विचरण करने लगता था कभी कभी वह अतीत कि सुनहरी यादें में खो जाता था उन सुनहरी यादें में उसके चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी तब कभी वह अपने बुरे समय को याद करके सिहर उठ जाता था तब कभी अर्ध चेतना में कुछ बड़बड़ाने लगता था ऐसे ही वह अतीत में चला गया था। जी हां उसका नाम सेठ धनीराम था मुंबई में कपड़े का बहुत बड़ा व्यापार था खुद कि टेक्सटाइल कंपनी थी अनेकों नोकर चाकर थे बड़ा बंगला था बड़ी बड़ी महंगी गाड़ियां कारें थी पत्नी थी तीन प्यारी प्यारी बेटियां जिन्हें उन्होंने बड़े लाड़-प्यार से पाल पोस कर तैयार किया था उस समय के सबसे अच्छे कालेज में पढ़ाया था  सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था अचानक उसे व्यापार में घाटा होने लगा था शायद बाजार से उसकी पकड़ कमजोर हो गई थी या फिर ...

नेता जी कि शव यात्रा

 देशभर के बड़े बड़े अखबारों ने माननीय नेता जी के स्वर्गवास पर खेद व्यक्त किया था साथ ही उनके मृत्यु का समय और शव यात्रा का समय भी लिखा था कुछ अखबारों के संपादक ने तों माननीय नेता जी बड़े बड़े लेख लिखकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कि थी तब कुछ संपादक महोदय ने ऊनकि जीवनी ही लिख डाली थी तब कुछ संपादक महोदय ने उन्होंने देश के लिए कैसा योगदान दिया लिखा था  कुछ आलोचक संपादक ने जीवन में नेता जी ने कैसे कैसे मुकदमा का सामना किया जैसे कि बलात्कार मारपीट भूमी पर जबरदस्ती कब्जा भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दे का कानूनी सामाना किया लेकिन नेता जी ने सफेद कुर्ता पायजामा पर दाग नहीं लगने दिया खैर मिस्टर खन्ना ने कलाइ घड़ी पर नजर डाली थी दस बजे शव यात्रा में शामिल होना था उन्होंने तुरंत अपने दोस्त रबि कांत को फोन किया था। खन्ना जी :- हैलो हैलो रबि  रविकांत :- अलसाई आवाज में हां जी खन्ना जी सुबह सुबह कैसे याद किया  खन्ना जी :-अबे क्या रात को ज्यादा पी ली थी शायद बिस्तर पर है और अरे हा वह तेरी गर्ल फ्रेंड.... रविकांत :- ही ही ही अरे यार उसकी सुबह चार बजे न्यूयार्क कि फ्लाइट थी चली गई अच्...

Love

न जाने क्यों कुछ दिनों से शुभम् को मन में बहुत बैचैनी  महसूस हो रही थी न जाने क्यों उसने अपने आप से कारण तलाश करने का बहुत प्रयास किया था लेकिन वह नहीं समझ पा रहा था इस विषय पर उसने डाक्टर से चेकअप कराया था उसकी सभी रिपोर्ट सामान्य थी फिर यह  बैचैनी क्यों क्यों  कभी कभी तो वह सारी सारी रात करवटें बदलते हुए निकाल देता था लेकिन नींद नहीं आती थी हर समय मन अंसात रहता था लेकिन क्यों  ऐसे ही एक बरसात कि रात में वह करवटें बदल रहा था तभी एकाएक उसने मोबाइल नंबर डायल किया था तीन चार वार भी डायल करने के बाद अलसाई आवाज में कहा गया  क्या हुआ मैंने मना किया था ना कि मुझे फोन मत करना  शुभम रूचि शायद यही नाम था प्लीज मुझसे बात किजिए  रूचि :-अब क्या हुआ देखिए हमारे तलाक का अदालत में मुकदमा चल रहा है हम जल्दी ही कानून से अलग-अलग रहने लगेंगे  शुभम :- रूचि देखो आज भी हम साथ साथ रह सकते हैं में तुम्हें अपनी आत्मा कि गहराई से चाहता हूं और देखो . उसकी बात पूरी रूचि ने सुनी ही नहीं थीं तभी मर्दाना आवाज में उसे सुनाई दिया था कौन हैं रूचि ने मेरा बेचारा पति  फिर रूचि ...