मध्य रात्रि का दूसरा पहर था आसमान में बादल छाए हुए थे और कभी तेज़ तों कभी रिमझिम बारिश कर रहे थे दूर कहीं आसमान में बिजली चमक रहीं थी उसके चमकने के कुछ सेकंड बाद भीषण गर्जन करने लगे थे ऐसा लगता था कि किसी पेड़ पर या फिर देवालय पर बिजली गिर गई थी अब गर्जन थमने के बाद कुत्तों को भी आपस में संवाद करने का मौका मिल गया था तभी तो गांव के सभी गली के कुर्ते भोंक भोंक कर ऐक दूसरे का हालचाल पूछ रहे थे कि सब कुशल मंगल तों है ना सभी भाई-बंधु सुरक्षित है ना? एसे ही मौसम में बूढ़े आदमी ने पत्नी से सुनतीं हों जरा मुझे पानी पिला देना तकलीफ के कारण उसके मुंह से ठीक-ठाक शब्द भी नहीं निकल पा रहे थे । बुढ़िया खटिया पर से उठ कर पानी पिलाया था फिर आज तुम्हारी तबियत ज्यादा ख़राब है में बेटों को जगातीं हूं और अभी गांव के डाक्टर के पास लें जाने का कहतीं हू चिंतित होते हुए उन्होंने कहा था। बूढ़े आदमी कि सांस तेज चल रही थी पेट में पानी जाने के बाद कुछ पलों के लिए आराम मिला था तभी तो उसने कहा था बेटों को जगाने से कोई फायदा नहीं होने वाला ऐसा लगता है कि अब धरती पर हमारा समय पूरा होने ...
जून के पहले सप्ताह कि तपती दोपहर थी गर्म हवाएं कहर ढा रही थी गांव के अधिकांश लोग अपने अपने घर पर कूलर बिजली के पंखे से ठंडी हवा ले रहे थे ऐसे मौसम में शंभू नाथ जी खेतों पर बूढ़े बरगद कि शीतल छाया में खटिया पर आराम कर रहे थे पास में ही मिट्टी का घड़ा पानी से भरा हुआ रखा था जो राहगीरों के लिए था।
राम राम भैया
राम राम मंगरू ऐसी दोपहर में कहां जा रहे हैं भैया शंभु नाथ जी ने कहा था
मंगरू पड़ोस के गांव का किसान था।
भैया कल से भैंसें नहीं आ रही है नदी कि ओर जा रहा था कहीं पानी में बैठी हों मगरु ने गमछे से पसीना पोंछते हुए कहा था।
हा हो सकता है भैंस और मछली ऐक जैसी हैं ऐसी गर्मी में पानी मे डूब कर जुगाली करना उन्हें अच्छा लगता है और हां कल शाम को पांच बजे के आसपास कुछ भैंसें नदी कि ओर जा रहीं थी उनमें ऐक भूरी आंखों वाली भैंस भी थी।
वह सभी मेरी ही हैं भगवान भला करें आप का जो आप ने बता दिया अच्छा चलता हूं मंगरू ने इजाजत लेना चाही थी ।
तनिक बरगद कि शीतल छाया में आराम कर लिजिए और ठंडा जल भी पी लिजिए ।
दोनों ही खटिया पर बैठ गए थे मंगरू ने केरिया में से पान सुपारी कत्था निकाल कर पान तैयार किया था और उसमें थोड़ी सी तंबाकू इलाइची डाली थी पान के पत्ते को मोड़कर लौंग से बंद कर दिया था दोनों लोगों ने पान का बीड़ा मुंह में रख लिया था।
अब उनके मुंह बकरे कि जुगाली जैसे चल रहे थे बीच बीच में गांव में हलचल कैसी चल रही है अगली बार सरपंच कौन बनेगा थोड़ी देर बाद वापस गर्मी के विषय पर आ गए थे।
मंगरू :- बरगद कि और देखकर भैया जब मैं छोटा था तब भी यह ऐसा ही था याद है आपको बचपन में हम सब इस कि जड़ों को मजबूत पकड़ कर झूला झूलते थें ।
शंभु नाथ :- हां हां सब कुछ याद हैं वो वाली टहनी उंगली से इशारा करते हुए उस पर हम सब बच्चे बैठ जाते थे और नीचे पैरों कि ताकत से उपर उठाते थें फिर झूलने में कितना सुख मिलता था आह आह काश वह बचपन फिर से वापस आ जाएं।
मंगरू :- हां भैया आप को याद तो होगा घर से हम सब स्कूल पड़ने जाते थे और कभी कभी सारे दिन नदी में तेरना फिर इसी बरगद कि टहनियों पर झूलना बाह कितना मज़ा आता था ।
शंभु नाथ:- हंसते हुए मंगरू तुम्हें याद तो आएगा ऐक बार पिताजी ने हमें पकड़ लिया था तुम सब तों भाग गए थे मेरी कैसी पिटाई हुई थी आज भी याद है इसी बरगद के नीचे कुछ सोचने के बाद मगरु सच कहूं उस पिटाई का मजा भी अलग था हर छड़ी में पिता जी का स्नेह झलकता था और घर जानें के बाद मां का पिता जी को डांटना बहुत अच्छा लगता था ।
बचपन कि यादें ताजा हो गई थी मगरु ने भैया जरा मोबाइल पर समय देखना मेरे ख्याल से तीन बज गए होंगे मुझे शाम को निमंत्रण में भी जाना हैं फिर बरगद कि और देखकर आप कि छांव में बहुत शीतलता मिली आप बूढ़े हों गये लेकिन अभी भी आप ने अपना स्वभाव नहीं बदला ।
शंभु नाथ:- हां मंगरू पिता जी बता रहे थे हमारे दादा के दादा जी छोटा सा पोधा लगाया था सात पिंडियों पहले मतलब सात पिंडियों ने इन्हीं कि छांव में बैठकर खेती-बाड़ी कि आज इनकी कृपा से हम हर प्रकार से संपन्न हैं दो बेटे हैं दोनों कि शादी भी कर दी है दोनों ही महानगर में अच्छी नोकरी कर रहे हैं हमारे लिए तों यह बूढ़े बरगद देवता समान है।
अच्छा भैया चलता हूं मंगरू नदी कि ओर चला गया था शंभु नाथ जी घड़े से ठंडा जल पीने के बाद फिर से खटिया पर आराम करने लगे थे तभी मोबाइल फोन कि घंटी बज उठी थी ।
हरे बटन को उपर करके उन्होंने हैलो कहां था दूसरी ओर बढ़ा बेटा जिसका नाम सुधीर था उसने चहकते हुए हैलो हैलो पापा आप कैसे हैं ।
में ठीक हूं मेरा बच्चा तूं कैसा है मुन्ना कैसा है बहूं बच्चे ऐक सांस में सभी का हाल चाल पूछ रहे थे।
पापा आराम से बात किजिए यहां सभी लोग अच्छे हैं और में मुन्ना अगले रविवार को आप को लेने के लिए आ रहें हैं अब कोई भी ना नुकर नहीं चलेंगी समझें ना आप !
ठीक है बेटा लेकिन कहें देता हूं कुछ दिन ही रहूंगा वापस गांव आ जाऊंगा शंभु नाथ जी ने कहा था।
पापा मां नहीं है आप अकेले रहकर खुद ही खाना बना रहें हैं और परेशान हों रहें हैं जो हम सब को अच्छा नहीं लगता कल ही तो बच्चे दादा जी दादा जी को बुलाइए झुटकी तो जिद ही पकड़ कर बैठ गई थी कि मुझे अभी दादा जी के पास जाना है।
शंभु नाथ जी खुश हो गए थे उनकी आंखों के सामने छुटकी का चेहरा आ गया था चहकते हुए कहा था ठीक है बेटा में तैयार रहूंगा ।
पापा में और मुन्ना छोटे बेटे का नाम गांव का मकान खेती-बाड़ी सब बेचकर शहर में बहुत बड़ा प्लाट खरीदना चाहते हैं मुन्ना ने जमीन घर का सोदा भी कर लिया है आप क्या कहते हों।
शंभु नाथ जी थोड़ी देर चुप रहें थें फिर उन्होंने कहा था बेटा जैसा तुम दोनों उचित समझों में तैयार हूं बूढ़ा आदमी हूं तुम दोनों के निर्णय से बाहर नही जा सकता लेकिन मेरी ऐक शर्त है तीन हिस्सों में पैसा का बटवारा होगा जमाने को देखकर मुझे भी पैसा चाहिए
।
अक्सर देखने को मिल रहा है कि बच्चे जमीन जायदाद बेचकर माता-पिता को अकेला दर दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं और सुनते हैं शहरों में वृद्धाश्रमों खुल गये वहां ले जाकर भर्ती कर देते हैं में भले ही कम पड़ा लिखा हूं लेकिन मुझे जमाने का बहुत ज्ञान है ।
कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हैं आप हम दोनों ने पहले ही फैसला कर लिया था कि शहर का प्लाट आपके नाम से ही खरीदेगे
अच्छा पापा रविवार को मिलते हैं अपना ख्याल रखना बेटे ने फोन काट दिया था।
शंभु नाथ ने ऐक बार भरपूर नज़र से बूढ़े बरगद को देखा था फिर वह विचार मग्न हो गए थे शायद खुद से लड़ रहे थे शायद किसी धर्मसंकट में फंसे हुए थे शायद...?
रविवार को दोनों गांव पहुंच गए थे साथ में जमीन खरीदने वाला सेठ भी था सभी बूढ़े बरगद कि छांव के नीचे बैठे हुए थें लेन देन कि बात चीत चल रही थी एकाएक शंभु नाथ जी ने सेठ जी से पूछ लिया था आप इस जमीन का क्या करेंगे।
में फेक्ट्री के लिए यह जमीन ले रहा हूं उसने बताया था ।
यह बरगद का पेड़ रहेगा ना शंभू नाथ जी ने प्रश्न किया था।
नहीं इसे काटना होगा क्योंकि बहुत बड़ा एरिया कवर कर रखा है और आप तो जानते है में व्यापारी हूं ऐक ऐक इंच जमीन का लाभ लेना जानता हूं सेठ ने उत्तर दिया था।
तब ठीक है सुधीर मुन्ना आप दोनों अपने हिस्से कि जमीन इन्हें बेच दें मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन में बरगद वाला खेत नहीं दूंगा।
मुन्ना यह कैसी जिद हैं पापा आप क्या करेंगे इस खेत को रखकर और इस बूढ़े बरगद को बचाकर।
शंभु नाथ:- सात पीढ़ी पहले हमारे दादा जी के दादा जी ने इस को लगाया था यह भी हमारे लिए पूर्वजों जैसा ही है आज जो तुम लोग शहर में अफसर बने हुए हों सब कुछ इसी कि कृपा से हुआ है ।
पता हैं तेरी मां मुझे इसी पेड़ के नीचे खाना पकाकर खिलातीं थी तपती धूप में खेती के काम से थकने के बाद यही ताज़गी मिलतीं थी अटूट मेहनत कर के तुम दोनों को पढ़ाया लिखाया था ।
मेरे जीते जी यह टुकड़ा कभी भी नहीं बिकेगा यह मेरा अंतिम फैसला हैं ।
शंभु नाथ जी कि जिद पर सभी हैरान रह गए थे कुछ देर बाद सेठ ने कहा था सुधीर जैसे कि मैंने आप लोगों को समझा आप को पैसा कि परेशानी नहीं है आप लोग अपने पिता जी कि भावनाओं का सम्मान करें मुझे तो और कही जमीन मिल जाएगी फिर शंभु नाथ जी को देखकर में आप को सेल्यूट करता हूं ऐक पेड़ के लिए इतना प्रेम काश आप जैसे सभी होते तब आज ऐसी गर्मी का सामना नहीं करना पड़ता।
दोनों बेटों ने एक दूसरे कि ओर देखा था उनकी आंखों आंखों में ही बात हों गई थी पापा आप से बढ़कर कोई नहीं आप भी तो हमारे बच्चों के लिए बूढ़े बरगद जैसे हैं उन्हें आप कि शीतल छाया कि जरूरत है हम यह जमीन नहीं बेच रहे हैं ठीक हैं अब आप हमारे साथ शहर चलिए और जब आप का गांव में रहने का मन हो हम खुद आप को लेकर आएंगे।
सीख हमारे जीवन में पेड़ों का बहुत बड़ा योगदान है उन्हीं से आक्सीजन मिलतीं है और तपती धूप में शीतल छाया अक्सर देखने को मिलता है कि महानगर कि चकाचौंध में लोग गांव के खेतों को बेचकर शहर में फ्लेट या घर खरीद लेते हैं मेरे ख्याल से गांव कि जमीन पेड़ बचाकर रखना चाहिए क्योंकि उन्हें पाल-पोस कर बड़ा करने वाले हमारे पूर्वज ही थें ऐसे पेड़ों को देखकर पूर्वज कि यादें ताजा हो जाती है ।
यह कहानी आप को कैसी लगी मुझे बताइए
लेखक का नाम महेन्द्र सिंह
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| बूढ़े बरगद कि शीतल छांव |

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